Saturday, May 23, 2015

"तनु वेड्स मनु रिटर्न्स"... Entertainment का high dose



"फिर दोनों की शादी हो गयी , फिर क्या हुआ ...शादी की बाद की कहानी कोई नही बताता" .... यह जुमला अब पुराना हो जाएगा ..क्योकि शादीi के बाद भी कहानी बनती तो है ... वह कहानी जो जानी पहचानी है ..जो प्यार की दुश्मन है ..जो बोरिंग जिंदगी से शुरु होती है ...और प्यार के खात्मे पर ख़तम होती है , यह कहानी भी कुछ ऐसी ही है ..जो प्यार के ख़त्म होने और फिर से प्यार होने के फलसफे को बयाँ करती है |

 निर्देशक आनंद एल रॉय और लेखन हिमांशु शर्मा की जोड़ी फिर एक ऐसी फिल्म का मंचन करती है की आप पहली फ्रेम से आखरी फ्रेम तक परदे से कुछ चिपके चिपके नज़र आते हैं | फिल्म तनु वेड्स मनु returns की कहानी में कहने के लिए कुछ नही है ...कहानी वही है जो नाम से ही पता चल जाती है ...अब अगर नाम तनु वेड्स मनु है तो कहानी में तनु की शादी तो राजा से होने से रही | वही होना है जो फिल्म का टाइटल कहता है , पर कैसे होना है यह दिखाना अपने आप में कला है और इसी बात के कलाकार है आनद एल राय |

फिल्म की कहानी शुरू होती है शादी के ४ साल बाद से जब शादी में सिर्फ झंझट और लड़ाई झगडा ही बचता है | तनु उर्फ़ तनूजा त्रिवेदी ( कंगना रानाउत) मनु उर्फ़ मनोज शर्मा से नाराज़ हो वापस कानपुर आ जाती है | इस नाराजगी की लड़ाई में पप्पी ( दीपक डोबरियाल ) जहाँ मन्नू भैया का साथ देते है तो वहीँ कंधे के रूप में तन्नु को मिलता है चिंटू ( मोहम्मद जीशान अयूब ) का साथ ..फिर कहानी में आता है ट्विस्ट और एक और राजा अवस्थी ( जिम्मी शेरगिल ) आ जाते हैं वहीँ कुसूम के रूप में कंगना रानाउत की फिर से entry होती है | अब ये कहानी कुछ रोचक मोड़ लेती हुई अपने नाम को पूरा करने निकल पड़ती है |

 फिल्म की कहानी  पर ज्यादा कुछ कहने के लिए कुछ नहीं है ,पर पटकथा   फिर भी अच्छी कही जा सकती है , संवाद (dialogue) उससे भी ज्यादा अच्छे और दमदार हैं  और अभिनय (एक्टिंग) तो अपने चरम पर है | कंगना रानाउत ने अपनी अदाकारी से सबको पानी पिलाया है , यह कहना सही नहीं होगा की बाकि सब की एक्टिंग कमजोर है , पर कंगना ने जो अभिनय दिखाया है ख़ास तौर पर कुसुम के किरदार में उसकी जितनी तारीफ़ की जाए कम लगती है | फिल्म के क्राफ्ट के नज़रिए से यह पार्ट १ से थोड़ी कमजोर है पर मनोरंजन के तराजू पर इसका पलड़ा कही भी नीचे नहीं झुकता है |

गीत -संगीत की बात की जाए तो ठीक ही कहा जाएगा .. ना बहुत अच्छा ना बहुत बुरा ...पर इसमें आपको कही वडाली बंधुओ की कमी लग सकती है | यहाँ पर तुलना अगर पार्ट १ से ना की जाए तो फिर इस शिकायत का कोई मतलब नही | एडिटिंग मख्खन की तरह लगती है ... पर सच्चाई तो यह है की हंसने  और ठहाके लगाने में इस और ध्यान ही नहीं जाता |

कुल मिला कर कहा जाए तो आनद एल राय और हिमांशु शर्मा ने इस फिल्म के जरिये अब खुद को एक अलग मुकाम दे दिया है | वैसे इससे पहले भी इन्हें किसी पिछड़े क्रम में नही रखा जा सकता था ,पर यह फिल्म यह साबित करती है की .. सफलता नसीब का खेल हो सकती है ..पर अच्छे काम चमत्कार से पैदा नहीं होते ... उनके लिए मेहनत लगती है जो इस फिल्म में दिखाई देती है ... खास तौर पर फिल्म के scene की detailing जबरदस्त है | जब लगि आवौं सीतहि देखि , होइही काजू मोहि हर्ष बिसेषी|| सुंदर काण्ड के इस चौपाई की खूबसूरती अपने आप में बढ़ जाती है जब आप सामने से तनु को आते हुए देखते हैं , रावन कहे जाने वाले राजा अवस्थी से सामने लेखक ने सीता के किरदार को सुन्दरकाण्ड की एक चौपाई से गढ़ दिया | एक ऐसी सीता जिसमे रामायण की सीता को कोई क्वालिटी ही नहीं है ..पर यह फिल्म की खूबसूरती और कलमकार की क्रिएटिविटी की कहानी है |

यह फिल्म एक फुल फ़्लैश entertainment की सौगात है , जो दर्शको को सिनेमा हाल तक खीचने में कामयाब रखेगी | फिल्म को सिर्फ इसलिए देखना की की जो पता है वो कैसे होगा और यह suspense बना रहना ही इस फिल्म की खासियत है , मुझे यहाँ पर संस्कृत की एक सूक्ति याद आती है " रसात्मक वाक्यं काव्यं " ...यानि रस से भरा वाक्य ही काव्य या कविता है ..इसे अगर थोडा बदल दिया जाए तो कहा जा सकता है " रसात्मक फिल्मम तनु वेड्स मनु रिटर्न्स "

Saturday, December 20, 2014

"PK is not just OK"

एक आदमी जो  इस ग्रह का नही है , किसी  दूसरी दुनिया से आया है और कमाल की बात यह है की आते ही उसका सामान चोरी हो जाता है ।( यह बात हमारी वैश्विक सोच को दर्शाती है की हम चोरी  करने में इतने आगे हैं की परग्रही का सामान भी चुरा ले ) अपने सामान की खोज से पीके  की शुरू हुई कहानी आत्मचिंतन और वैचारिक बुद्धिमता तक पहुंच जाती है , धर्म , भगवान पर सवाल खड़े होते हैं और कहानी आगे बढ़ती जाती है ।

निर्माता विधु विनोद चौपड़ा और निर्देशक राजकुमार हिरानी की यह फिल्म एक सामान्य से सवाल का सामान्य सा जवाब असामान्य तरीके से पेश करने की कोशिश करती है । फिल्म के पहले ही फ्रेम से फिल्म का अच्छा लगना शुरू हो जाता है और फिर ये कशिश अंत तक बनी रहती है । कथानक के मामले में फिल्म थोड़ी सी कमजोर पड़ जाती है पर प्रस्तुतिकरण अच्छा है और कमजोर पड़ने का कारन सिर्फ इतना है की हम पहले ही इस मुद्दे पर एक सशक्त फिल्म देख चुके हैं । फिल्म के अगर स्क्रीनप्ले पर नज़र जाये और अगर हम यह भूल जाये की इन्ही लेखको ने ३ इडियट्स और मुनाभाई सीरीज का स्क्रीनप्ले लिखा था तो इसे उम्दा कहा जा सकता है वरना नही ।  राजकुमार हिरानी इस बार थोड़ा निराश किया है स्क्रीनप्ले बुरा नहीं था पर उम्मीद कुछ ज्यादा की थी । निर्देशन वही हसने रुलाने के नमकीन मीठे बिस्किट जैसे एक बाईट में दो दो स्वाद  ।  इस बार संवाद में वो पंच लाइन कहीं गायब है जो  राजकुमार हिरानी की फिल्मो मिलती थी चाहे वो "जादू की झप्पी" हो या "तोहफा कबूल करो" ।

एक्टिंग में अमीर खान ने अच्छा काम किया है ।धुम ३ के बाद निराश हुई जनता के लिए ये अच्छी खबर है । अनुष्का शर्मा ने भी रोल की अदायगी में जी जान लगा दी  है और सुशांत राजपूत ने भी  पर फिर भी विशेष नहीं कहा जा सकता ।बोमन ईरानी , कम रोल में भी बेहतरहीन लगे है और संजय दत्त ने भी बहुत अच्छे से अपने किरदार को निभाया है ।editing  और गीत संगीत में कहने के लिए कुछ विशेष नहीं । सिर्फ ठरकी छोकरो ही  एक मात्र ऐसा गाना है जो फिल्म खत्म होने पर याद रह जाता है ।

कुल मिला कर  फिल्म अच्छी है , पर अगर आप राजकुमार हिरानी के Die Hard Fan हैं  तो फिर आपको थोड़ी निराशा हाथ लग सकती है क्योकि , एक बार ५६ पकवान खाने के बाद खिचड़ी खाना थोड़ा अरुचिकर लगता ही है और यह राजकुमार हिरानी की मसालेदार खिचड़ी है । है मसालेदार पर है तो  खिचड़ी , हाँ अगर कोई दूसरा निर्देशक इस तरह की फिल्म बनाता तो यह पुलाव कही जा सकती थी |

आपके सुझावो के इंतजार में ....लकुलीश 

Monday, October 6, 2014

"हैदर" विशाल भरद्वाज की खूबसूरत हेमलेट


"जब तक हम इंतकाम से आज़ाद नही होंगे , वाकई में आज़ाद नही होंगे"| आज आज़ाद भारत के  ६० दशक पुरे होने के बाद भी हम इंतकाम से आज़ाद नही हो पाएं हैं, कभी यह इंतकाम दंतेवाड़ा में होता है तो कभी फ़र्ज़ी इनकाउंटर बन कर इरशत जहाँ की याद दिला जाता है , पर इस एक बात को लेकर अगर हैदर जैसी खूबसूरत फिल्म बन पड़े तो इस बात के लिए  विशाल भारदवाज बधाई के पात्र हैं।

  फिल्म "हैदर" विलियम शेक्सपियर के नाटक हेमलेट से प्रभावित है , नाटक का फिल्म पर कितना प्रभाव है इस बात को कहना मेरे लिए मुश्किल है, पर यह कहना बहुत आसान है की एक फिल्म के स्क्रीनप्ले के लिहाज़ से कहानी अच्छी बन पड़ी हैं।

 फिल्म की कहानी कश्मीर के अंतर्दन्द की कहानी है जहाँ हैदर (शहीद कपूर ) के पिता (नरेंद्र झा) को सेना एक छापामार कार्यवाही में आतंकवादियों की मदद करते हुए पकड़ लेती है और काफी वक़्त तक उनका कोई पता नहीं चलता । हैदर अपनी माशुका अर्शिया (श्रद्धा कपूर ) के साथ अपने पिता को खोजने की बहुत कोशिश करता है और वहीँ दूसरी और हैदर का चाचा खुरम( के के मेनन ) अपनी भाभी(तब्बू ) के साथ निकाह पड़ने की कोशिश में होता है , फिल्म अपनी पकड़ थोड़ी सी ढीली होती है तभी रूहदार (इरफान खान) फिल्म में हैदर की ज़िंदगी में एक नए भूचाल के साथ इंट्री करता है और हैदर की पूरी ज़िंदगी को बदल देता है अपने पिता की खोज से शुरू हुई यह फिल्म रिश्तो के ताने-बाने बिखेरते हुए एक जबरदस्त अंत तक जा पहुँचती है |

 कहानी के साधारण होने के बाजवूद भी पटकथा (स्क्रीनप्ले ) में फिल्म रोचक हो जाती है, उसके बाद कश्मीर की खूबसूरत नज़ारे, और रंगो के बेजोड़ समन्वय फिल्म की खूबसूरती को और बड़ा देती है ,इस फिल्म को देखने के बाद आपके मन में एक ख्याल जरूर आता है की क्या वाकई कश्मीर इतना खूबसूरत हैं।

 अभिनय के तराजू पर तौला जाये तो शाहिद कपूर ने यह सिद्ध करने की पूरी पूरी कोशिश की है की वह पंकज कपूर की जागीर ( अभिनय की भी ) के सही वारिस हैं।  श्रद्धा कपूर फिल्म में बेहद खूबसूरत लगी है पर एक्टिंग में थोड़ी कमजोर पड़ गयी है ,पर फिर भी अपने किरदार को निभाने में पूरी तरह से सफल रहीं , हैदर के पिता के किरदार में नरेंद्र झा ने छोटा पर प्रभावशाली रोल किया है , तब्बू, इरफ़ान खान  और के. के मेनन के लिए सिर्फ एक ही बात कही जा सकती है- शानदार ।

 अब अगर गीत और संगीत के बारे में बात की जाये तो मेरा शब्दकोष बगले झाँकने लगता हैं , गुलज़ार ने एक मुद्दत बाद किसी फिल्म के लिए इतने दिल खोल कर गाने लिखे है , अलग-अलग शब्द से सजे ऐसे जैसे हलवाई ने अलग अलग तरह की मिठाइयों से दूकान सजा रखी हो , जिनमे खोया , घी  और शक्कर ही है पर  जायका अलग है । और इन शब्दों पर विशाल भरद्वाज के संगीत ने  गुड में घी का काम किया है । गुरु-चेले की यह जोड़ी इतने विविधता पूर्ण और अच्छे गानो के लिए बधाई की पात्र है।

फिल्म में कश्मीर के हर पहलु और समस्याओ को दिखाते हुए हर मुद्दे पर बात करने की कोशिश की गयी है, हर पक्ष को पेश किया गया है पर अगर आप दिमाग अपने घर पर छोड़ कर गए हैं तो फिर यह कहना मुश्किल है की आप धागो से वह सारे सिरे पकड़ पाएंगे जो फिल्म में बिखरे हुए से हैं |  यह फिल्म कहीं नहीं कहती की कौन बुरा है पर वह यह जरूर कहती है की बुराई हर जगह हैं। कुल मिलकर यह फिल्म  विशाल भरद्वाज की बेहतरीन फिल्मो में से एक है , जिसे देखने के लिए दोस्त , गर्लफ्रेंड और पॉपकॉर्न को थोड़ा नाराज़ करने की जरुरत है ,क्योकि अगर आप परदे पर से नज़र हटाएंगे तो कश्मीर की सुन्दर वादियों के किसी शानदार नज़ारे को खो देंगे।
........................................................आपके सुझाव के इंतज़ार मे ...लकुलिश



Monday, June 24, 2013

"राँझना "आनंद राय की एक ईमानदार कोशिश,


                                                           
                                             
                               "'मैनें तुझसे मोहब्बत की यह मेरा टेलेन्ट है।"
 सिर्फ इतनी सी लाइन दिल को तसल्ली देने के लिए काफी है, ये आशिको का मिलाजुला दर्द है जिन्होंने प्यार तो किया पर प्यार पाया नहीं . फिल्म राँझना एक ऐसे आशिक की कहानी है जिसने सिर्फ प्यार किया और कुछ नहीं . राँझना कहानी है कुंदन(धनुष) नाम के एक लड़के की  जो  दक्षिण भारतीय ब्राह्मण है और काशी में रहता है वो वहां रहेने वाली एक मुसलमान लड़की जोया से प्यार करने लग जाता है ये प्यार की कहानी तब शुरू होती है जब वो सिर्फ ८ साल का है.  बचपन की दहलीज़ से जवानी के उन्माद तक वो सिर्फ जोया का है . जोया ( सोनम कपूर) कुंदन से नहीं बल्कि अकरम (अभय देओल )से प्यार करती है .इस प्यार के चक्रव्यूह में प्यार को पाने और खोने की जद्दोजहत चलती रहती है और यह  जद्दोजहत किसी आम प्रेम कहानी की तरह नहीं है ,जहाँ दो लड़के  एक लड़की के लिए आपस में लड़ते हो ये जद्दोजहत तो सच्चे प्यार की तलाश और अपने प्यार को पाने की उम्मीद की है .फिल्म कई मोड़ लेती और एक ऐसे अंत पर पहुचती है जहां  फिल्म के किरदारों के साथ साथ दर्शको की भी  सिसकियाँ सुनाई  देती है .

 फिल्म का निर्देशन किया है तनू वेड्स मन्नू  फेम आनंद एल राय ने, कहानी लिखी है हिमांशु शर्मा ने , संगीत की बागडोर संभाली है ए आर रहमान ने। फिल्म के निर्देशन की बात करें तो आनंद राय ने कमाल किया है। तनु वेड्स मन्नू से जो उम्मीदे  जगी थी आनंद राय न सिर्फ उन उम्मीदों  पर खरे उतरे बल्कि दो कदम आगे जा कर उन्होंने यह  काम किया है। फिल्म कहने को सिर्फ १४०  मिनिट की है पर फिल्म में एक एक फ्रेम इतने करीने से रखी  गयी है की आपको लगता है जेसे आप न जाने कब से बैठ कर यह फिल्म देख रहें हो।   हर फ्रेम से आप एक जुडाव, एक लगाव महसूस करते है।  फिल्म में दिखाई गए शहर खुद को बयाँ करते है यह तो निर्देशक की खासियत भी है। फिल्म की  छोटी छोटी बारीकियां दर्शको के अंतर्मन पर गहरा प्रभाव छोडती है . फिल्म में कहानी और निर्देशन के बाद अगर  किसी और बात ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया है तो वो  है फिल्म के डॉयलाग . अभिनय की बात की जाये तो बिंदिया ( स्वरा भास्कर) , मुरारी ( मोहम्मद अयूब ) से लेकर अभय देओल , धनुष और सोनम सभी ने अपने अपने किरदारों के साथ न्याय किया है पर खास तौर पर धनुष , मोहमद अयूब और स्वरा भास्कर ने  अपने अपने किरदार में कमाल किया है . फिल्म का म्यूजिक ठीक ठाक  की श्रेणी में रखा जा सकता है .संपादन (एडिटिंग) भी मक्खन की तरह से एक एक फ्रेम को आराम से आगे बढ़ाती जाती  है।

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है की यह फिल्म एक ईमानदार प्रयास है , प्यार का, प्यार के इम्तेहान का और इस बात की सच्चाई का कि प्यार पाने का नहीं सिर्फ देने का नाम है। सिर्फ देने का . . . . .


आपके सुझावों के इंतजार में लकुलीश..........

Tuesday, April 24, 2012

अच्छी कॉमेडी का स्पम - विकी डोनर

"ये दुनिया एक स्पम है"  ये ख्याल किसी दार्शनिक व्यक्ति या किसी बाबा के प्रवचन की प्रसिद्ध अभिव्यक्ति नहीं है ,ये जुमला है  फिल्म विकी डोनर का  । निर्देशक शुजित सरकार और निर्माता जान अब्राहम के मिलन से बनी यह फिल्म एक हलकी फुलकी कामेडी के साथ बड़े ही संवेदनशील मुद्दे को दर्शको के सामने रखती है ।

फिल्म कहानी है विकी खुराना (आयुष्मान सिंह ) नाम के दिल्ली के एक लड़के की जो की वेल्ला ( बेरोजगार ) है और कोई अच्छी सी नोकरी करना चाहता है ।डा. चडड़ा(अन्नू कपूर)  एक फर्टिलिटी क्लिनिक चलाते हैं  और बेऔलाद जोड़ो का इलाज़ करते हैं । एक दिन डा. चडडा (अन्नू कपूर ) की नज़र विकी पर पड़ती है और उन्हें  विकी के रूप में एक अच्छा स्पम डोनर दिखाई देता है,  वह विक्की को साम और दाम के तरीके से स्पम डोनेट करने के लिए तैयार कर लेंते  है। यही डोनेशन आगे जा  कर विकी की व्यक्तिगत जिंदगी में दुःख का कारण बन जाता है । खुद को आधुनिक कहने वाले समाज के इस मुद्दे पर कई रूप नज़र आने लगते है और इन्ही उलझनों को सुलझाती हुई फिल्म अपनी हाइप पर जा कर ख़त्म हो जाती है ।

अभिनय के तराजू पर फिल्म का हर किरदार बराबर खरा साबित हुआ है ।मुख्य किरदार के रूप में आयुष्मान ने अच्छा काम किया है उसके लहजे,हाव -भाव ,तौर-तरीके पूरी तरह से विकी के केरेक्टर में फिट बैठे है । यामी गौतम (फिल्म में आशिमा रॉय ) की खूबसूरती तो कमाल लगी ही है साथ ही उसका अभिनय भी खुबसूरत बन पड़ा है ।अन्नू कपूर तो अभिनेता हैं ही उनके लिए और किसी शब्द की जरुरत नहीं  हां यह कहना लाज़मी होगा की उनकी दो उंगलियों के इशारे और मुहावरों के साथ उनका ठेठ पंजाबी अंदाज लम्बे समय तक दिमाग  में दर्ज रहेगा ।दादी के रोल में कमलेश गिल और माँ के रूप में डोली अल्हुवालिया ने पूरी तरह से न्याय किया है ।

फिल्म का निर्देशन जानदार है ,निर्देशक शुजित सरकार ने कोई लटका -झटका फिल्म में नहीं रखा है, सिंपल शाट और सीन से फिल्म की कहानी  को प्रदर्शित किया है ।फिल्म के डायलाग सिंपल और ह्यूमर से भरपूर है हर किरदार के डायलाग उसके केरेक्टर को दर्शाते है जेसे डा. चडडा (अन्नू कपूर) का हमेशा स्पम के मुहावरों में बात करना या माँ के किरदार में डोली का पंजाबी लफ्जों में अपने बेटे को कोसना । फिल्म की खासियत इसके साधारण पर सशक्त प्रस्तुतिकरण में है ।गीत संगीत के लहजे से पानी डा रंग और रम - विस्की अच्छे नंबर बन पड़े है।गीत के बोल ठीक- ठाक है पानी दा रंग को छोड़ कर किसी भी गीत के बोल ने बहुत प्रभावित नहीं किया है  ।सिनेमेटोग्राफी और एडिटिंग में कहने के लिए ज्यादा कुछ खास नहीं है ।

विकी डोनर एक आधुनिक विषय का प्रस्तुतिकरण है ,फिल्म की नज़र से पूरी तरह से मनोरंजक और विषय की नज़र से कुछ नया । फिल्म इंटरवल तक तो सुपरफास्ट ट्रेन की तरह भागती है पर उसके बाद थोड़ी धीमी हो जाती है , फिर भी यह धीमी गति फिल्म में बोर नहीं करती । इस फिल्म के लिए आखिर में इतना ही कहना काफी होगा की कॉमेडी के लिए फूहड़ता और बड़ी स्टार कास्ट की जरुरत नहीं होती बल्कि जरुरत होती है एक अच्छी स्क्रिप्ट और उसके अच्छे  निर्देशन  की जिसमे लेखिका जूही चतुर्वेदी और निर्देशक शुजित सरकार सफल हुए है।

 

Thursday, April 19, 2012

दान

सुबह - सुबह उसके छोटे से ठेले से उठती पोहे और जलेबी की खुशबु बरबस किसी भी भूखे पेट को अपनी और खींच लेने के काबिल थी और  यही मेरे साथ भी हुआ। मै चुम्बक की तरह उस दुकान की और खीच गया। दुकान पर थी नाश्ता करने वालो की भीड़ और दुकानदार का ठेठ मारवाड़ी अंदाज । आडर देने वाले कहते भिया इक पोए -जलेबी देना और दुकानदार कहता लो सेठ अपने  पोहे-जलेबी  हां महाराज आपको क्या दू । दो अलग अलग लहजे और बोली के शब्द मिलकर मीठी जलेबी और तीखे पोहे का काम कर रहे थे । मेने भी मारवाड़ी भैया से  कहा 'दादा इक पोहा कचोरी देना और ५० ग्राम जलेबी'।अभी मेने पोहे का पहला निवाला खाया ही था की  तभी वंहा पर इक अधेड़ उम्र की महिला आई और हाथ फैला कर भीख मांगने लगी ,उम्र होगी यही कोई ५० -६० साल, चेहरे पर दयनीयता और आँखों में सूनापन।उसके आते ही भीड़ थोड़ी कटने लगी कोई भी उसकी और नहीं देख रहा था और न ही उसकी मांग पर ध्यान दे रहा था । वो मेरे पास आई और बोलने लगी राजा बाबु कल से कुछ नहीं खाया कुछ खिला दे बेटा , भगवान तुझे तरक्की दे , तेरी छमक छमक लाड़ी आये बेटा ,कुछ नहीं तो एक चाय ही पिला दे । वेसे में भिखारियों को भीख देने में ज्यादा यकीं नहीं रखता पर उसकी हालात  देख मेने दुकानदार से  कहा भैया इनको एक पोहा दे देना दुकानदार ने मेरी और देखा और इस तरह मुंह बनाया जैसे  कह रहा हो कि बाबु जी इस औरत का रोज का ही काम है , पर मेने उसकी बात अनसुनी कर दी । मुझे  देख कर कुछ और लोगो ने १-२ रूपए के  खुल्ले पैसे उसे दे दिए । वो पोहे लेकर एक और जमीन पर बैठ गयी और खाने लगी और मुझे देख कर मुस्कुराने लगी ।मुझे यूँ  लगने लगा जेसे मैंने कोई महान काम कर दिया हो ,बचपन में पड़ी नैतिक शिक्षा की किताब के पन्ने मेरे आस पास से गुजरने लगे, मुझे लगा के मै  धर्मात्मा हूँ, दानी हूँ, मुझमे अब भी इंसानियत बाकि है, मेने अपने हिस्से में से किसी और को दिया ।यह सब सोच कर मेरी छाती फूलने लगी थी की तभी एक कुत्ता वहां  आ गया और एक और खड़े होकर हसरत से पूंछ हिलाने लगा वहां खड़े लोगो को घूरने लगा। मै कुत्ते कि हरकतों को देख रहा था कि  तभी पुचकारने की एक आवाज आई  और मेने देखा की वह अधेड़ महिला अपनी प्लेट में से कुछ पोहे कुत्ते के लिए निकाल रही थी ।

अब मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि दानी कौन है और इंसानियत कहाँ बची है ।

Wednesday, December 7, 2011

वाय थिस कोलावारी दी


मेरा एक दोस्त अचानक मुझसे बोलने  लगा की दादा (प्यार से मुझ से छोटे दोस्त मुझे दादा कहते है  पर में कही से भी दादा नहीं लगता ) आप इस गाने को कैसे  पसंद कर सकते हो जो की पूरी तरह से बेसिर पैर का है |. उसकी बात एक तरह से सही भी थी, मै अक्सर आपने दोस्तों के बीच एक अच्छा समीक्षक बनने की कोशिश करता रहता था(पता नहीं मेरा यह गुमान कब जायेगा या फिर शायद सच में किसी दिन बन जाऊ ) और आज में ही एक ऐसे गाने की तारीफ कर रहा था जो एक समीक्षक के नज़रिए से पूरी तरह से भाषा के व्याकरण की ऐसी तेसी करने वाला होना चाहिए |  पर यहाँ मै दिमाग से नही बल्कि दिल से सोच रहा था | मेरे दिल को ये गाना पसंद था और .घर आकर मैंने इस बात पर दिमाग को भी लगा दिया की आखिर इस गाने में ऐसा क्या है जो लोगो को अपनी तरफ अट्रेक्ट कर रहा है |  बहुत सोचने के बाद मैंने  यह पाया की ये  एक ऐसी अभिव्यक्ति है जो बचकानी है ,टूटी फूटी है ,सुसंस्कृत नही है और अंग्रेजी की ग्रामर का इतना भलता (अटपटा ) इस्तेमाल पर फिर भी इस गाने में एक बचपना है, मासूमियत है, भोलापन है , भाषा के बंधन से आजाद केवल भावनाए है जो संगीत के माध्यम में बह रही है| यह बिलकुल वैसा  है जेसे एक छोटे बच्चे की अजीब सी बोली जो मन को भा जाती है जिसके लिए उसका व्याकरण सम्मत न होना ही उसकी खूबी है  और यह खूबी  ही कोलावारी दी को इतना खास बना रही है |

इसके अलावा एक बात और है जिसने कोलावारी दी को "ड कोलावारी दी " बनाया  है और वह बात है कुछ नया स्वीकार करने  की हमारी प्रवत्ति |  हमेशा ५६ भोग खाने वाले के लिए खिचड़ी से बढ़िया व्यंजन  कोई और नहीं हो सकता | कभी कभी हम जानते है की जो हम कर रहे है वो सही नहीं है पर उस वक़्त वही करना अच्छा लगता है क्योंकी हमारे हाजमे की उस वक़्त की  मांग वही है|   यही हाल कोलावारी दी का भी है वो दाल, चावल, टमाटर, प्याज़, आलू , और मटर से सजी मसालेदार खिचड़ी है जो किसी के भी मुह में पानी ला देने के लिए काफी है | इस स्वाद पर कोई तर्क भारी नहीं पड़ सकता | .कभी..हिमेश रेशमिया ,अल्ताफ राजा के गानों पर भी इसी तरह का उन्माद दिखा था  वो अब बासी खिचड़ी है यह ताज़ी ताज़ी गरमारम खिचड़ी है  पर हां यह बात भी याद रखना पड़ेगी की खिचड़ी सिर्फ गर्म ही अच्छी लगती है तो थोड़े दिन जब तक माहोल गर्म है तब तक दिमाग  को साइड में रखकर गाते है | why this kolavari kolavari kolavari di ...why this kolavari kolavari di........धी धिन धिन..................आपकी प्रतिक्रियाओ के इंतजार में |