Sunday, January 16, 2011

पैसा वसूल है - यमला पगला दीवाना


एक परिवार जो फिल्म की शुरवात में बिछड़ जाता है और आखिर में मिल जाता है " यह एक ऐसा विचार है जिसने हिंदी सिनेमा की कई ब्लाक बस्टर्ड फिल्म को रचा है और इसी लाइन को एक बार फिर कहानी बनाकर मसखरे अंदाज में भुनाया है निर्माता नितिन मनमोहन और निर्देशक समीर कार्निक ने अपनी फिल्म यमला पगला दीवाना में ।
फिल्म की कहानी के नाम पर परिवार के बिछड़ने की दास्ताँ है । बड़ा भाई परमवीर सिंह ( सनी देवोल ) अपनी माँ ( नफीसा अली ) के साथ कैनेडा में रहता है जिसका अपना परिवार और बच्चे है । एक दिन उसे पता चलता है कि उसके पिता धरम सिंह( धमेंद्र ) और भाई गजोधर ( बोबी देवोल )बनारस में है और लोगो को ठगने का काम करते है । इधर बनारस में गजोधर एक फोटो ग्राफर साहिबा ( कुलजीत रंघावा ) से प्यार करता है और उसे पाना चाहता है । अब पूरी फिल्म हर किरदार की चाहत को हासिल करने की कहानी बन जाती है परमवीर परिवार को एक करना चाहता है, गजोधर और साहिबा शादी करना चाहते है और धरम सिंह अपनी गलतियों की माफ़ी चाहता है । इस चाहत के बीच है साहिबा के भाई जोगिन्दर सिंह (अनुपम खैर ) और उसकी गैंग ; कुछ गुदगुदाते द्रश्य ; बहुत सी ट्रेजेडी और मसाला और बन जाती है फिल्म यमला पगला दीवाना

फिल्म का निर्देशन ठीक ठाक है। समीर कार्निक कॉमेडी की गाड़ी को हाकने में सफल रहे है फिल्म की लम्बाई कुछ ज्यादा है पर इसे नजर अंदाज़ किया जा सकता है | फिल्म के संगीत के लिए एक लंबी कड़ी ने मेहनत की है जिसमे लक्ष्मी कान्त प्यारेलाल के "मै जट यमला पगला " गीत से लेकर अनु मालिक,आर.ड़ी बी .और राहुल सेठ का नाम शामिल है । इस विविधता के करण ही "टिंकू पिया और चमकी जवानी " ज़हा आईटम नंबर है वंही "चड़ा दे रंग" और "गुरबानी" गंभीर प्रस्तुति है । अभिनय की कसोटी पर सनी देओल सब पर भारी है ;धर्मेन्द्र और बाबी का भी अच्छा काम है । अनुपम खेर अपने अनोखे अंदाज में लाजवाब लगे है वही कुलजीत रंघावा की ख़ूबसूरती का फिल्म में कोई जवाब नहीं; माँ के किरदार में नफीसा अली ने थोडा निराश किया है।

संपादन ,छायांकन, पटकथा आदी ठीक है । फिल्म में जो बनारस का घाट दिखता गया है वो म.प. का महेश्वर घाट है , जो ख़ूबसूरती के मामले में कही भी कमजोर नजर नहीं आया ; महेश्वर में फिल्माए गए कुछ द्रश्य तो इतने सुन्दर है की उन पर नजर चिपकर रह जाती है

सारांशतः यह एक हलकी फुलकी मनोरंजक फिल्म है जिसकी कॉमेडी में फूहड़ता का तड़का नहीं है इसलिए इसे पुरे परिवार के साथ बैठ कर इसे देखा जासकता है, और फिल्म में हँसते मुस्कुराते हुए कहा जा सकता है की ये जट "यमले पगले दीवाने " इती सी बात न जाने के के के ..................


आप के सुझाव के इंतजार में .....लकुलीश शर्मा

Saturday, January 8, 2011


no one killed jesica ;जेसिका को किसी ने नहीं मारा, यही खबर थी देश के प्रमुख अखबारों में जेसिका लाल हत्या काण्ड के सन्दर्भ में । एक सनसनीखेज़ हत्या कांड जिसमे करीब ३०० लोगो की मोजुदगी में मनु शर्मा ने ड्रिंक न देने की बात पर मॉडल जेसिका लाल की गोली मार कर हत्या कर दी| परन्तु अदालत में गवाहों के मुकर जाने पर मनु शर्मा छुट गया । मीडिया द्वारा तुल पकड़ने पर यह केस फिर से खुला और हाई कोर्ट में मनु शर्मा को उम्र कैद की सजा हुई । इसी सत्य घटना पर आधारित है फिल्म "नो वन किल्ड जेसिका "

फिल्म में कहानी यही सिलसिला बयां करती है पर थोडा फ़िल्मी अंदाज में , फिल्म की शुरवात में यह साफ़ कर दिया गया है की यह फिल्म सत्य घटना पर केद्रित है परन्तु वृतचित्र (documentary) नहीं इसलिए फिल्म में नाटकीय तत्व है। यह कहना लाजमी है की फिल्म में थोड़ी बहुत नाटकीयता जो निर्देशक राजकुमार गुप्ता ने कायम की है वो फिल्म के हिसाब से जरुरी भी है ।

फिल्म मुख्यतः जेसिका की बहन सबरीना (विद्या बालन ) और रिपोर्टर मीरा (रानी मुखर्जी ) पर केन्द्रित है । फिल्म में सबरीना जहा घरेलु और सीधी -साधी लड़की है |वही मीरा एक तेज तर्राट ,बातो में अपशब्दों का प्रयोग करने वाली और किसी से न डरने वाली रिपोर्टर के किरदार में है । फिल्म में इन दोनों अभिनेत्रियों का काम काबिले तारीफ है न कोई कम न कोई ज्यादा ;दोनों ने अपने किरदार को पूरी तरह से जिया है

पटकथा ,डायलाग और निर्देशन की बागडोर राजकुमार गुप्ता के हाथ में है | "आमिर " फेम राजकुमार गुप्ता ने दर्शको को निराश नहीं किया , फिल्म की कहानी इंटरवल के पहले थोड़ी धीमी है पर इंटरवल के बाद दर्शको को पलक झपकने का मोका नहीं मिलता । म्यूजिक निर्देशक के तौर पर देव डी और आयशा फेम अमित त्रिवेदी का बेहतरीन काम है । अमित की धुन पर अमिताभ भटाचार्य ने बोलो को बुनकर अच्छे गाने बनाये गए है । संपादन के काम को आरती बजाज ने एक बार फिर अच्छे से निभाया है । यानि बालिवूड में नए साल की अच्छी शुरवात ।

एक बात यहाँ कहना जरुरी है की थोड़े दिन पहले आई फिल्म पीपली लाइव ने जहा मीडिया के नकारात्मक पहलु को उजागर किया था वही यह फिल्म मीडिया के सकारात्मक पहलु से रूबरू कराती है । दोनों ही फिल्म में मुद्दे की बात सिर्फ इतनी है कि -व्यावसायिकता और टी.आर.पी की भूख को सही मुद्दों से शांत करना चाहिए या बेबात की खबरों से । इस बात को एक अच्छे प्रस्तुतीकरण के साथ बयां करने के लिए राजकुमार गुप्ता की पीठ जरुर थपथपाई जानी चाहिए ।

Sunday, December 26, 2010

तीस मार खान को झेल पाना "आसन काम" नहीं


कहा जाता है की इस दुनिया में किसी को रुलाना बहुत आसान है परन्तु किसी को हंसा पाना बहुत मुश्किल,अगर आप तीस मार खान देख रहे है ये कहावत कुछ ऐसी हो जाती है कि यहाँ हँसना मुश्किल है और रोना तो लगभग ना मुमकिन । हां टिकिट पर खर्च किये गए पैसे को याद करके शायद आपके आंसू निकल आये ।

फराह खान द्वारा निर्देशित और शिरीष कुंदर ,टिवंकल खन्ना ,रोनी स्क्रूवाला द्वारा निर्मित '' तीस मार खान '' पूरी तरह से दर्शको की सब्र का इम्तिहान है । फिल्म में कहानी है एक चौर की जो बड़ा विख्यात है और जिसके पीछे पूरी पुलिस फौर्स पड़ी है । वह एक चौरी का कांट्रेक्ट लेता है और आखिर में चोरी कर लेता है । इस कांसेप्ट में डाले जाते है कुछ उलजलूल डायलाग , द्विअर्थी कॉमेडी और सेक्स का भौंडापन बस बन जाती है फिल्म तीस मार खान|
फिल्म में लाजिक तो है ही नहीं मनोरंजन के नाम पर भी कुछ नहीं है| ढाई घंटे की इस फिल्म से ज्यादा हंसी और मनोरंजन तो आधे घंटे के कॉमेडी सर्कस और लाफ्टर शो में हासिल किया जा सकता है । फिल्म में आधे से ज्यादा कार्य तो शिरीष कुंदर ने किये है- निर्माता ,बेग्राउण्ड स्कोर ,संपादन, स्टोरी, स्क्रिप्ट सब कुछ कुंदर के ही भरोसे है जो की पूरी तरह प्रभाव हीन प्रस्तुति है ।

संगीत निर्देशक विशाल -शेखर है और डांस की कमान फरहा खान और गीता कपूर के हाथ में है । शीला की जवानी के लटको को छोड़ कर संगीत और डांस की प्रस्तुति सामान्य ही है । अभिनय के नाम पर किसी अभिनेता के पर ऊँगली नहीं उठाई जा सकती क्योकि निर्देशक फरहा खान ने जिस तरह का अभिनय प्रस्तुत करवाना चाहा है हर कलाकार ने खुद को उसी रूप में प्रस्तुत किया है । इस कार्य के लिए अक्षय कुमार ,अक्षय खन्ना , और सपोर्टिंग रोल में अमन वर्मा बधाई के पात्र है । कटरीना पूरी फिल्म में खूबसूरत दिखी है पर उसे अभिनय करने का कोई मोका ही नहीं दिया गया । बाकि पूरी फिल्म में कहने -सुनाने के लिए कुछ नहीं है । न तो निर्देशन की खासियत ,न संपादन की कसावट और न ही कहानी की गति| हाँ परन्तु मार्केटिंग के नजरिये से यह बात सिखने योग्य है की कैसे "शीला की जवानी" के बल पर दर्शको को थियेटर हाल तक खीचा जा सकता है । आखिर में फिल्म के तीस मार खान यानि अक्षय कुमार के अंदाज में कहा जा सकता है की

"सूरज को सीधे देख पाना और तीस मार खान को झेल पाना आसान नहीं है "

आपके सुझाव का इंतज़ार रहेगा ......................लकुलीश शर्मा

Saturday, December 4, 2010

"खेले हम जी जान से "


खेले हम जी जान से यानि आशुतोष गोवारिकर एक बार फिर हाज़िर है फिल्म जगत में अपनी पारी खेलने को । अभिषेक बच्चन , सिकंदर खेर ,दीपिका पादुकोण जैसे स्टार से सजी यह फिल्म एक सत्य घटना पर आधारित फिल्म है | फिल्म का आधार है १९३० का चटगांव ( वर्त्तमान बंगलादेश ) विद्रोह पर |
फिल्म में सुरज्या सेन की भूमिका में है अभिषेक बच्चन ,कल्पना दत्त की भूमिका में है दीपिका पादुकोण ,सिकंदर खेर निर्मल सेन के रोल में है । इस के अलावा मनिंदर (अनंत ) विशाखा सिंह (प्रीतिलता ) के किरदार में है । फिल्म की कहानी की शुरवात होती है १९३० के परिवेश से जहा चटगांव के कुछ साहसी व्यक्ति आज़ादी के लिए क्रांति की योजना बना रहे है| तब उनकी क्रांति में कुछ बच्चे भी हिस्सा लेना चाहते है जिनके खेल का मैदान अंग्रेजो ने छीन लिया है । उनका दल(इंडियन रिपब्लिक आर्मी ) यह तय करता है , की १८ अप्रेल १९३० को वह चटगांव से अंगेजी राज्य का खत्म कर आजादी का आगाज़ करेंगे । पूरी फिल्म इस फैसले और इसके बाद की कार्यवाही पर चलती है । सबसे पहले आशुतोष गोवारिकर बधाई के पात्र है जिन्होंने इस तरह की सत्य घटना पर( जो की लगभग उपेक्षित है) फिल्म बनाने का प्रयास किया । फिल्म का कांसेप्ट बहुत शानदार है परन्तु इस कांसेप्ट से बनी पटकथा उतनी उम्दा नहीं जितनी की अपेक्षा की जा सकती थी |फिल्म का सबसे कमजोर पक्ष है उसकी अच्छाइयो और श्रेष्ठता को निर्देशन द्वारा न भुना पाना । अगर निर्देशक ''लगान'' वाला हो तब उम्मीदे और बड जाती है ऐसे में आशुतोष गोवारिकर ने निर्देशक और पटकथा लेखक के तौर पर सही नहीं उतर पाए । फिल्म अच्छी है पर इसे सर्वश्रेष्ठ बनाया जा सकता था ।

इस फिल्म की खामियों में द्रश्यो का उबाऊ होना , सीन का बेवजह लम्बा होना ,दिलीप दिओ द्वारा ख़राब संपादन और संवादों(डायलाग ) का बेअसर होना माना जा सकता है । वही फिल्म की अच्छाइयो में फिल्म का संगीत ,उसकी मूल कथा और देश -भक्ति की भावना को रखा जा सकता है |

अभिनय के तराजू पर सभी कलाकारों का प्रदर्शन ठीक ठाक है । यहाँ पर फिरोज वाहिद खान (फिल्म में लोकनाथ बाल) का उल्लेख आवश्यक है । फिरोज ने कुछ द्रश्यो में शानदार स्वाभाविक अभिनय किया है । गीत -संगीत पक्ष अच्छा है जिसके लिए जावेद अख्तर और सोहेल सेन बधाई के पात्र है ।

फिल्म के लिए आखिर में यही कहा जा सकता है की काफी वर्षो बाद भारतीय स्वतंत्रा संग्राम की सत्य घटना को लेकर कोई फिल्म आई है जिसे देखना हमारी उन शहीदों के प्रति आदरांजलि है जिन्होंने सोलह वर्ष की आयु में ही अपने प्राणों का त्याग माँ भारती के लिए कर दिया । फिल्म में भले ही मनोरंजन ,इमोशन और प्रभाव की कमी हो परन्तु उन गुमनाम देशभक्तों का चित्रण करने के लिए आशुतोष गोवारिकर को इतना पारितोष तो दिया ही जाना चाहिए |

आपकी प्रतिक्रियाओ का इंतजार रहेगा ............लकुलीश शर्मा

Friday, November 19, 2010

हेर्री पोटर प्रगतम


विन्गारियम लेविओसा ( हवा में उड़ने वाला जादुई मंत्र )
यानि हेर्री पॉटर की जादुई दुनिया के ख़यालात एक बार फिर हाज़िर है आप को जादुई सैर कराने के लिए । सन २००१ में जब हेर्री पॉटर सीरिज की पहली फिल्म हेर्री पॉटर और पारस पत्थर ( English tital - Harry potter and soccer's stone ) रिलीज हुई थी तब किसी को अंदाजा नहीं था यह जादू इस तरह भारतीय दर्शको के सर पर चढ़ कर बोलेगा ।

हेर्री पॉटर सीरिज की सातवी फिल्म मौत के तोहफे की कहानी शुरू होती है और पूरी दुनिया पर वोल्ड मोर्ट का कहर दिखाया जाता है । वोल्ड मार्ट का एक ही सपना है की हेर्री पॉटर को मौत के घाट उतार दिया जाये और इस काम के लिए वह अपनी पूरी फोज़ को लगा देता है| वंही दूसरी और हेर्री खुद को अकेला और असहाय mahsus कर रहा है । वह वोल्ड मार्ट का मुकाबला करने और उससे खत्म के लिए उसकी आत्मा के टुकड़े ( हु क्रक्स )को ढूढने का फैसला करता है | उसके इस फैसले में उसका साथ देते है रोन विजली (रुपर्ट गिन्त) और हरमायनी ग्रेंजर (एम्मा वाटसन ) । पूरी फिल्म दो तरफ़ा संघर्ष की कहानी है एक और हेर्री पॉटर का मकसद और दूसरी ओर वोल्ड मार्ट के शैतानी इरादे ।

डेनिअल रेडक्लिफ (हेर्री) ,एम्मा वाटसन (हरमायनी ) ,रुपर्ट गिन्त (रोन ) का अभिनय अच्छा है पर बहुत उम्दा नहीं । रेफल फिन्स (वोल्ड मोर्ट )ने अपनी दहशत ओर चालाकी को अभिनय से बरक़रार रहा है । फिल्म के बाकी कलाकार ने भी सधा हुआ अभिनय किया है फिर चाहे वह कलाकार २ मिनिट के लिए ही स्क्रीन पर आया हो ।

फिल्म का निर्देशन डेविड येट्स ने किया है जिन्होंने इस सिरीज़ की पिछली दो फिल्म मायापंछी का समूह (order of phoenix) ओर हाफ ब्लड प्रिन्स का निर्देशन किया है उनके निर्देशन का तकनीकी कोशल शानदार है परन्तु कहानी की कसावट ओर प्रभाव में वह इस सिरीज़ के अन्य निर्देशक जेसे क्रिश कोलंबस ( परस पत्थर ओर तहखाने का रहस्य फेम ) से काफी पीछे है ।

फिल्म में कहानी का आकर्षण इस सिरीज़ की अन्य फिल्म के मुकाबले कमजोर है फिल्म देख रहा दर्शक जब फिल्म जब इंटरवल के बाद १५ से २० मिनिट तक स्लो हो चुकी मूवी को देखता है तो खुद को थोडा बोर महसूस करने लग जाता है |हेर्री पॉटर सीरिज जैसे -जैसे अंत की ओर बड रही है वेसे वेसे इसका तकनिकी पक्ष तो मजबूत हो रहा है पर भावनात्मक तोर पर कमजोरी आ रही है |उदहारण के तोर पर इस फिल्म की सिनेमेटोग्राफी इतनी खुबसूरत है की कुछ द्रश्यो से आँखे नहीं हटती वही डायलोग इतने कमजोर की कही पर भी तालियों की गूंज सुनाई नहीं देती ।

कुल मिलाकर यह फिल्म देखने के बाद आपको इसकी अगली किस्त यानि हेर्री पॉटर ओर मौत के तोहफे भाग -२ का इंतजार रहेगा जो की हेर्री पॉटर सिरीज़ की खासियत है । फिल्म देखते हुए आप जादुई दुनिया में खो जायेगे ओर उस दुनिया से बाहर निकलने के लिए आप भी कहेगे
"अलहमोरा (जादुई मंत्र जो दरवाजा खोले के लिए कहा जाता है)

Sunday, October 24, 2010

रक्त -चरित्र


"मोहिनी सूरत दिल के खोटे
नाम बड़े और दर्शन छोटे"


पिछले हफ्ते की दो बड़ी फिल्मो को देख कर बस भगवान् दादा का यह गाना ही याद आता है। पिछले हफ्ते रिलीज हुई आक्रोश अच्छी पटकथा होने के बावजूद कमजोर निर्देशन की भेट चढ़ गयी वही इस हफ्ते रीलिज रक्त-चरित्र का हाल भी कुछ एसा ही है या फिर यु कहे की इससे भी बदतर है ।
रक्त -चरित्र में चरित्र नहीं है सिर्फ रक्त ही रक्त है पूरी फिल्म में दिखाई देता है सिर्फ खून ,खून , और खून । पटकथा के नाम पर दो परिवारों की लड़ाई है जो बाद में जातिगत लड़ाई बन जाती है । और पूरी फिल्म में बस मारा मारी होती रहती है । फिल्म देख कर एसा लगता है की मानो ये कोई वृतचित्र( documentry) है जो यह जानकारी देती है की इंसान को कितने तरीको से मारा(क़त्ल किया) जा सकता है ।

फिल्म की शुरवात होती है आनंदपुर गाव की भूमिका से जिसमे वह फैली गुंडागर्दी को background voice के साथबताया जाता है की यह फिल्म सत्य घटना पर आधारित है परन्तु फिल्म में दिखाए गए द्रश्यो से आतिरेक की गंध आती है ।

फिल्म में प्रताप रवि (विवेक ओबेरॉय ) एक पिछड़ी जाती का पड़ा लिखा और समझदार नौजवान है जिसके पिता को राजनेतिक हथकंडो के तहत मार दिया जाता है जिसका बदला प्रताप रवि लेता है फिल्म में शत्रुघ्न सिन्हा एक नेता- अभिनेता के शिवा जी के रोल में है जिसकी एक राजनेतिक पार्टी है आगे जाकर वह प्रताप रवि को raajniti में लाने के लिए प्रस्त्भूमि बनाता है । फिल्म के अंत में प्रताप रवि का वर्चस्व बाद जाता है और फिल्म क्रमश : पर ख़त्म हो जाती है फिर दर्शको से आग्रह किया जाता है की आगे क्या होगा यह जानने के लिए देखिये रक्त चरित्र पार्ट -२ जो १९ november को रिलीज होगी ।

फिल्म में अगर अभिनय की बात करे तब विवेक ओबरी की पीठ थपथपाई जा सकती है ,विवेक के अतिरिक्त अभिमन्यु सिंह (फिल्म में भुक्का रेड्डी )का भी अभिनय काबिले तारीफ है । फिल्म का कैमरा वर्क अच्छा और विविधता लिए है जो पूरी तरह से दक्षिण भारतीय फिल्मो की तरह उपयोग किया गया है ,संपादन ठीक ठाक है ,संगीत पर कोई टिपण्णी न की जाये तो ही बेहतर है। आखिर में कहा जा सकता है की सत्या ,कंपनी जेसी फिल्म देने वाले रामगोपाल वर्मा से लगाईं उम्मीद रक्त -चरित में पूरी नहीं होती दिखाई देती।

अब देखना यह है की पहले से घोषित रक्त-चरित पार्ट कितनी पब्लिक जुटा पाती है। क्योकि दूध का जला छाछ भी फूंक- फूंक कर पीता है

Friday, October 1, 2010

अनजाना-अनजानी :क्यों बनी ये कहानी



ना जानते तुम्हे तो बेहतर ही था|
जान कर अनजान बनना हमारी फितरत नहीं ||

निर्माता साजिद नदियावल और निर्देशक सिद्धार्थ आनंद की फिल्म अनजाना - अनजानी दो विपरीत स्वभाव वाले व्यक्तियों की प्रेम कहानी है | फिल्म में आनंद (रणबीर कपूर और कियाना (प्रियंका चोपड़ा )दोनों आत्महत्या करना चाहते है और दोनों की मुलाकात आत्हत्या की कोसिस करते हुए हो जाती है |दोनो आत्महत्या करने में असफल हो जाते है औरतब दोनों फैसला करते है की २० दिन में अपने सारे काम और शौक पूरा कर के साथ में मरेंगे |बस यही से प्यार पनपने की परीस्थिति शुरू हो जाती है और और हर भारतीय मसाला प्रेम कहानी की तरह एक सुखद अंत पर फिल्म ख़तम हो जाती है |

देखा जाये तो इस फिल्म का कांसेप्ट थोडा हट कर है परन्तु उसे भुनाने में निर्देशक सिद्धार्थ आनंद असफल रहे है |फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी इसकी कमजोर पटकथा और उसमे कसावट की कमी है और रही सही कसर उसका सामान्य निर्देशन पूरा कर देता है |फिल्म का पहला भाग तो पूरी तरह से बोर करता है इंटरवल के बाद फिल्म कुछ गति पकडती है पर बीच बीच में लोकल ट्रेन की भांति रुक जाती है |

अभिनय के मामले में रणबीर और प्रियंका दोनों ने अच्छा काम किया है बल्कि कई द्रश्यो में प्रियंका ने रणबीर को मात भी दी है |फिल्म में यदि कुछ इमोशन ,ड्रामा और कामेडी का तड़का होता तो यह अभिनय और उभर के सामने आता। फिल्म में जो थोडा बहुत हास्य का पुट है भी तो वह सिर्फ द्विअर्थी द्रश्यो से पैदा होता है जिसका असर सीमित रहता है |फिल्म का संपादन और धव्नियांकन औसत दर्जे का है । आश्चर्य की बात है की विशाल -शेखर( म्यूजिक डायरेक्टर ) और सलीम -सुलेमान (बेग-ग्राउंड एसकोर ) जेसी दो बड़ी संगीत जोडियो के होने के बावजूद संगीत में कहने को कुछ खास नहीं है । फिल्म में कुछ संवाद जरुर अच्छे है जो जीवन के मायने पिरोने के लिए लिखे गए है

कुल मिला कर कहा जा सकता है की यदि यह फिल्म पिछले हफ्ते रिलीज हो जाती तब यह उस सप्ताह की एकमात्र फिल्म होती परन्तु इस हफ्ते लगभग २०० करोड़ वाली फिल्म रोबोट के सामने अंजना- अनजानी का प्यार कमाल दिखा पाए इस बात में संदेह है |क्योकि दर्शक मनोरंजन की नब्ज़ पहचानते है | साहब ये पब्लिक है यह सब जानती है |