Thursday, April 19, 2012
दान
Wednesday, December 7, 2011
वाय थिस कोलावारी दी
मेरा एक दोस्त अचानक मुझसे बोलने लगा की दादा (प्यार से मुझ से छोटे दोस्त मुझे दादा कहते है पर में कही से भी दादा नहीं लगता ) आप इस गाने को कैसे पसंद कर सकते हो जो की पूरी तरह से बेसिर पैर का है |. उसकी बात एक तरह से सही भी थी, मै अक्सर आपने दोस्तों के बीच एक अच्छा समीक्षक बनने की कोशिश करता रहता था(पता नहीं मेरा यह गुमान कब जायेगा या फिर शायद सच में किसी दिन बन जाऊ ) और आज में ही एक ऐसे गाने की तारीफ कर रहा था जो एक समीक्षक के नज़रिए से पूरी तरह से भाषा के व्याकरण की ऐसी तेसी करने वाला होना चाहिए | पर यहाँ मै दिमाग से नही बल्कि दिल से सोच रहा था | मेरे दिल को ये गाना पसंद था और .घर आकर मैंने इस बात पर दिमाग को भी लगा दिया की आखिर इस गाने में ऐसा क्या है जो लोगो को अपनी तरफ अट्रेक्ट कर रहा है | बहुत सोचने के बाद मैंने यह पाया की ये एक ऐसी अभिव्यक्ति है जो बचकानी है ,टूटी फूटी है ,सुसंस्कृत नही है और अंग्रेजी की ग्रामर का इतना भलता (अटपटा ) इस्तेमाल पर फिर भी इस गाने में एक बचपना है, मासूमियत है, भोलापन है , भाषा के बंधन से आजाद केवल भावनाए है जो संगीत के माध्यम में बह रही है| यह बिलकुल वैसा है जेसे एक छोटे बच्चे की अजीब सी बोली जो मन को भा जाती है जिसके लिए उसका व्याकरण सम्मत न होना ही उसकी खूबी है और यह खूबी ही कोलावारी दी को इतना खास बना रही है |
इसके अलावा एक बात और है जिसने कोलावारी दी को "ड कोलावारी दी " बनाया है और वह बात है कुछ नया स्वीकार करने की हमारी प्रवत्ति | हमेशा ५६ भोग खाने वाले के लिए खिचड़ी से बढ़िया व्यंजन कोई और नहीं हो सकता | कभी कभी हम जानते है की जो हम कर रहे है वो सही नहीं है पर उस वक़्त वही करना अच्छा लगता है क्योंकी हमारे हाजमे की उस वक़्त की मांग वही है| यही हाल कोलावारी दी का भी है वो दाल, चावल, टमाटर, प्याज़, आलू , और मटर से सजी मसालेदार खिचड़ी है जो किसी के भी मुह में पानी ला देने के लिए काफी है | इस स्वाद पर कोई तर्क भारी नहीं पड़ सकता | .कभी..हिमेश रेशमिया ,अल्ताफ राजा के गानों पर भी इसी तरह का उन्माद दिखा था वो अब बासी खिचड़ी है यह ताज़ी ताज़ी गरमारम खिचड़ी है पर हां यह बात भी याद रखना पड़ेगी की खिचड़ी सिर्फ गर्म ही अच्छी लगती है तो थोड़े दिन जब तक माहोल गर्म है तब तक दिमाग को साइड में रखकर गाते है | why this kolavari kolavari kolavari di ...why this kolavari kolavari di........धी धिन धिन..................आपकी प्रतिक्रियाओ के इंतजार में |
Saturday, September 3, 2011
ज्वलंत मुद्दों को उठाती फिल्म "बोल"
आपके सुझावों के इंतजार में .......... लकुलीश शर्मा ( मात्राओ की गलती के लिए क्षमा करे वो वेब साईट की कुछ दिक्कत है )
Saturday, August 13, 2011
आरक्षण -ः जाना था जापान पहुच गए चीन
आरक्षण ये नाम ही चेहरे पर शिकन या मुस्कान लाने के लिए काफी है गर आरक्षण मिलने वाला हो तो मुस्कान और छीनने वाला हो तो शिकन ।
इस सम्वेदनशील मुद्दे को अपनी फिल्म के जरिये परोसने का काम किया है निर्माता निर्देशक प्रकाश झा ने
फिल्म की पृष्टभूमि भोपाल की है जहाॅ शकुंतला ठकराल महाविधालय एक प्रसिद्द महाविधालय है और प्रो. प्रभाकर (अमिताभ बच्चन वहा के प्रसिपल दीपक कुमार ( सेफ अली खान) जो कि हरिजन समुदाय से सम्बध रखता है वहाॅ का गेस्ट लेक्चरार है।पूर्वी प्रभाकर(दीपिका पादुंकोण) और सुशांत सेठ(प्रतिक बब्बर वहाॅ पढते है ।सुश्ंाात,पूर्वी,दीपक तीनो अच्छे दोस्त है।फिल्म का एक मुख्य किरदार मिथलेश सिंह (मनोज वाजपेयी भी वहीं पर पढाता है ।जिसका प्रायवेट कोचिंग इस्टीटुयुट भी है।
फिल्म की शुरुआत होती है इस मुद्दे के साथ कि प्रायवेट कम्पनी में जाति और स्तर के आधार पर चयन किया जाता है।वहीं सरकारी विभाग में कोटे के नाम पर पद बाटें जाते है। इस बात को लेकर सुशंात सेठ और दीपक दोनो को अपनी जिंदगी मे दिक्कतो का सामना करना पडता है ।इस बात के कारण दीपक आरक्षण का समर्थक बन जाता है वहीं सुशंात विरोधी ।इसी वक्त सुप्रीम कोर्ट का एक आदेश पारित होता है जिसमे 27 प्रतिशत आरक्षण बढा दिया जाता है इस मुद्दंे पर सुप्रिम कोर्ट का समर्थन करने पर प्रो प्रभाकर (अमिताभ को काॅलेज से निकाल दिया जाता है और उनका धर भी उनसे छीन जाता है। बाकि कि पूरी फिल्म प्रभाकर के आत्मसम्मान और धर वापस पाने की कहानी को बंया करती नजर आती है ।
आरक्षण के साथ -साथ इस फिल्म मे शिक्षा के व्यवसायिकरण पर भी जोर दिया गया है और यह जोर इतना है कि फिल्म के 45 मिनिट बीत जाने पर फिल्म आरक्षण बनाम अनारक्षण से हटकर प्रायवेट कोचिंग बनाम सही शिक्षा व्यवस्था पर केन्द्रीत हो जाती है।
फिल्म के सशक्त पहलु में अमिताभ बच्चन सेफ अली खान और दीपिका की एक्टींग और डायलाॅग को रखा जा सकता है वही फिल्म की एडिटिंग सिनेमेटोग्राफी और टीªटमेटं कमजोर कडh है।
फिल्म की गति कई द्दश्यो में टुटती नजर आती है।वहीं सिनेमेटोग्राफी ने न तो भोपाल की खुबसुरती को परोसा है और न ही अभिनेता के अभिनय को ।फिल्म के गाने अच्छे बन पडें है और पाश्र्वसगींत ने भी अच्छी भूमिका को निभाया है पर जब गाने स्क्रिन पर दिखाई देते है तो हीरो के होटं से मेल ही नही खाते ।इन सारी बातों को नजरअदांज कर भी दिया जाए तब भी सबसे ज्यादा निराशा इस बात से होती है कि फिल्म का नाम आरक्षण है पर पूरी फिल्म शिक्षाः सेवा या व्यवसाय इस बात पर धुमती है।फिल्म में आरक्षण के मुद्दे को छुआ भर है और कुछ नही ।
प्रकाश झा ने राजनीति में भोपाल को पहले भी दिखाया था पर इस फिल्म मे पूरा परिदृश्य भोपाल केन्द्रीत है ।ऐसे में अचरज की बात है कि किसी अभिनेता के डायलाग में भोपाली टच नही है। इंतहा तो यह है कि तबेलेवाला भी युपी की टोन मे बात करता है। जबकि भोपाल की अपनी एक जबान है तरिका है जो पूरी फिल्म मे कहीं नजर नही आता।
कुल मिलाकर फिल्म मसालेदार है जिसमें सैफ अमिताभ और दीपिका के दमदार अभिनय और डायलाग का तडका है। अच्छे गीत सगींत की मजेदार करी है पर यह मसाला आरक्षण नाम की लुभावनी डिश को मजेदार नही बना पाता है ।फिल्म देख कर ऐसा लगता है कि जाना था जापान पहुच गए चीन।
Saturday, August 6, 2011
ये आफिस जरा देखा- भाला है।

Tuesday, July 12, 2011
मर्डर-2 एक औसत प्रस्तुती

Saturday, July 2, 2011
आमिर के प्रयोग क़ी नयी खेप "देल्ही-बेली "

तीन आम शहरी लड.के जो एक साथ रहतें है।रोज सुबह अपने काम पर जाते हैं। पारम्परिक लडको की तरह उनका एक गन्दा सा कमरा होता है। दरवाजा खोलने से लेकर सुबह जल्दी उठकर पानी भरने के लिए काम बाटे जाते है और सारे काम एक दुसरे पर टाले जाते है। यानि आम लडको टाईप जिन्दगी।इस आम जिन्दगी मे एक दिन भुचाल तब आ जाता है जब ये सब डान के चक्कर में फँस जाते है। इस सिचुएशन को खुलेपन और चुटिले अंदाज में पेश किया है निर्माता अमीर खान और निर्देशक अभिनव देव ने अपनी फिल्म देल्ही बेली में |
फिल्म में तोशी(इमरान खान ) अरुप (वीर दास ) नितिन (कुनाल रायॅ कपूर ) तीनो रुम-मेट है।तोशी और नितिन एक न्युज पेपर में काम करतें है वंही अरुप एक एनिमेशन कम्पनी में कार्टुनिस्ट है। सोनिया(शहनाज) तोशी की गर्लफ्रेड. है।वह तोशी को एक पार्सल एक पते तक पहुँचाने को देती है जो उसे उसकी एक दोस्त ने करने को कहा था।तोशी वह पार्सल नितिन को देता है और चुकिं नितिन का पेट खराब हो जाता है इसलिए वह पार्सल अरुप को देता है। अरुप वह पार्सल उसके पते पर डिलिवर कर देता है बस यही पर एक छोटी सी चुक हो जाती है जिसके कारण माफिया और फिर पुलिस इन तीनो दोस्तो के पीछे पड। जाती है।और फिर पूरी फिल्म भाग डिके बोस भाग की लाइनो पर चलती जाती है।
फिल्म का निर्देशन उम्दा है फिल्म की गति कहीं पर भी टुटती नजर नही आती है निर्देशक अभिनव देव ने फिल्म को कहीं भी लीक से हटने नही दिया है ।सिनेमेटोग्राफी ने दिल्ली के माहोल को पुरी तरह जिंदा करने की कोशिश की है कोई भी फ्रेम बेकार की चीजों से लदी दिखाई नही देती । एडिटिंग ने निर्देशन और सिनेमेटोग्राफि की बची कुची कसर पुरी कर दी है।अभिनय के तराजु पर इमरान खान कमजोर दिखे है वहीं विजय राज(डान) और वीर दास का पलड़ा थोडा भारी है बाकि कलाकारो का काम भी औसत की श्रेणी मे रखा जाता है। संगीत पक्ष उम्दा है ,भाग डी के बोस ,चुडैल, स्विटी तेरा प्यार ,नगद वाले डिस्को उधार वाले खिसको जैसे गाने सिचुएशन पर पुरी तरह फिट नजर आते है।
इस पूरी फिल्म की खासियत है इसका प्रस्तुतिकरण, फिल्म के डायलाग में हद से ज्यादा खुलापन है पर ये आज के दौर की वास्तविकता है । हाँ यह कहा जा सकता है कि इस तरह के शब्दो का प्रयोग सिनेमा जैसे विस्तृत माध्यम में किया जाना उचित नही है पर इस बहस पर सबके अपने अपने तर्क हो सकतें है । यंहा पर यह ध्यान रखना जरुरी है कि यह कोई पारिवारिक फिल्म नही है। इसलिए इसे देखना व्यक्तिगत पंसद का विषय है।वैसे भी जिस फिल्म के प्रमोशन में ही अगर निर्माता निर्देशक खुद यह स्वीकार कर रहे हो कि यह फिल्म बच्चे न देखें तब यह तो समझा जा सकता है कि इस फिल्म के विषय और भाषा में कुछ तो गोलमाल है|
आपके सुझाव के इंतजार में ..................................लकुलीश शर्मा


