Monday, June 24, 2013

"राँझना "आनंद राय की एक ईमानदार कोशिश,


                                                           
                                             
                               "'मैनें तुझसे मोहब्बत की यह मेरा टेलेन्ट है।"
 सिर्फ इतनी सी लाइन दिल को तसल्ली देने के लिए काफी है, ये आशिको का मिलाजुला दर्द है जिन्होंने प्यार तो किया पर प्यार पाया नहीं . फिल्म राँझना एक ऐसे आशिक की कहानी है जिसने सिर्फ प्यार किया और कुछ नहीं . राँझना कहानी है कुंदन(धनुष) नाम के एक लड़के की  जो  दक्षिण भारतीय ब्राह्मण है और काशी में रहता है वो वहां रहेने वाली एक मुसलमान लड़की जोया से प्यार करने लग जाता है ये प्यार की कहानी तब शुरू होती है जब वो सिर्फ ८ साल का है.  बचपन की दहलीज़ से जवानी के उन्माद तक वो सिर्फ जोया का है . जोया ( सोनम कपूर) कुंदन से नहीं बल्कि अकरम (अभय देओल )से प्यार करती है .इस प्यार के चक्रव्यूह में प्यार को पाने और खोने की जद्दोजहत चलती रहती है और यह  जद्दोजहत किसी आम प्रेम कहानी की तरह नहीं है ,जहाँ दो लड़के  एक लड़की के लिए आपस में लड़ते हो ये जद्दोजहत तो सच्चे प्यार की तलाश और अपने प्यार को पाने की उम्मीद की है .फिल्म कई मोड़ लेती और एक ऐसे अंत पर पहुचती है जहां  फिल्म के किरदारों के साथ साथ दर्शको की भी  सिसकियाँ सुनाई  देती है .

 फिल्म का निर्देशन किया है तनू वेड्स मन्नू  फेम आनंद एल राय ने, कहानी लिखी है हिमांशु शर्मा ने , संगीत की बागडोर संभाली है ए आर रहमान ने। फिल्म के निर्देशन की बात करें तो आनंद राय ने कमाल किया है। तनु वेड्स मन्नू से जो उम्मीदे  जगी थी आनंद राय न सिर्फ उन उम्मीदों  पर खरे उतरे बल्कि दो कदम आगे जा कर उन्होंने यह  काम किया है। फिल्म कहने को सिर्फ १४०  मिनिट की है पर फिल्म में एक एक फ्रेम इतने करीने से रखी  गयी है की आपको लगता है जेसे आप न जाने कब से बैठ कर यह फिल्म देख रहें हो।   हर फ्रेम से आप एक जुडाव, एक लगाव महसूस करते है।  फिल्म में दिखाई गए शहर खुद को बयाँ करते है यह तो निर्देशक की खासियत भी है। फिल्म की  छोटी छोटी बारीकियां दर्शको के अंतर्मन पर गहरा प्रभाव छोडती है . फिल्म में कहानी और निर्देशन के बाद अगर  किसी और बात ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया है तो वो  है फिल्म के डॉयलाग . अभिनय की बात की जाये तो बिंदिया ( स्वरा भास्कर) , मुरारी ( मोहम्मद अयूब ) से लेकर अभय देओल , धनुष और सोनम सभी ने अपने अपने किरदारों के साथ न्याय किया है पर खास तौर पर धनुष , मोहमद अयूब और स्वरा भास्कर ने  अपने अपने किरदार में कमाल किया है . फिल्म का म्यूजिक ठीक ठाक  की श्रेणी में रखा जा सकता है .संपादन (एडिटिंग) भी मक्खन की तरह से एक एक फ्रेम को आराम से आगे बढ़ाती जाती  है।

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है की यह फिल्म एक ईमानदार प्रयास है , प्यार का, प्यार के इम्तेहान का और इस बात की सच्चाई का कि प्यार पाने का नहीं सिर्फ देने का नाम है। सिर्फ देने का . . . . .


आपके सुझावों के इंतजार में लकुलीश..........

Tuesday, April 24, 2012

अच्छी कॉमेडी का स्पम - विकी डोनर

"ये दुनिया एक स्पम है"  ये ख्याल किसी दार्शनिक व्यक्ति या किसी बाबा के प्रवचन की प्रसिद्ध अभिव्यक्ति नहीं है ,ये जुमला है  फिल्म विकी डोनर का  । निर्देशक शुजित सरकार और निर्माता जान अब्राहम के मिलन से बनी यह फिल्म एक हलकी फुलकी कामेडी के साथ बड़े ही संवेदनशील मुद्दे को दर्शको के सामने रखती है ।

फिल्म कहानी है विकी खुराना (आयुष्मान सिंह ) नाम के दिल्ली के एक लड़के की जो की वेल्ला ( बेरोजगार ) है और कोई अच्छी सी नोकरी करना चाहता है ।डा. चडड़ा(अन्नू कपूर)  एक फर्टिलिटी क्लिनिक चलाते हैं  और बेऔलाद जोड़ो का इलाज़ करते हैं । एक दिन डा. चडडा (अन्नू कपूर ) की नज़र विकी पर पड़ती है और उन्हें  विकी के रूप में एक अच्छा स्पम डोनर दिखाई देता है,  वह विक्की को साम और दाम के तरीके से स्पम डोनेट करने के लिए तैयार कर लेंते  है। यही डोनेशन आगे जा  कर विकी की व्यक्तिगत जिंदगी में दुःख का कारण बन जाता है । खुद को आधुनिक कहने वाले समाज के इस मुद्दे पर कई रूप नज़र आने लगते है और इन्ही उलझनों को सुलझाती हुई फिल्म अपनी हाइप पर जा कर ख़त्म हो जाती है ।

अभिनय के तराजू पर फिल्म का हर किरदार बराबर खरा साबित हुआ है ।मुख्य किरदार के रूप में आयुष्मान ने अच्छा काम किया है उसके लहजे,हाव -भाव ,तौर-तरीके पूरी तरह से विकी के केरेक्टर में फिट बैठे है । यामी गौतम (फिल्म में आशिमा रॉय ) की खूबसूरती तो कमाल लगी ही है साथ ही उसका अभिनय भी खुबसूरत बन पड़ा है ।अन्नू कपूर तो अभिनेता हैं ही उनके लिए और किसी शब्द की जरुरत नहीं  हां यह कहना लाज़मी होगा की उनकी दो उंगलियों के इशारे और मुहावरों के साथ उनका ठेठ पंजाबी अंदाज लम्बे समय तक दिमाग  में दर्ज रहेगा ।दादी के रोल में कमलेश गिल और माँ के रूप में डोली अल्हुवालिया ने पूरी तरह से न्याय किया है ।

फिल्म का निर्देशन जानदार है ,निर्देशक शुजित सरकार ने कोई लटका -झटका फिल्म में नहीं रखा है, सिंपल शाट और सीन से फिल्म की कहानी  को प्रदर्शित किया है ।फिल्म के डायलाग सिंपल और ह्यूमर से भरपूर है हर किरदार के डायलाग उसके केरेक्टर को दर्शाते है जेसे डा. चडडा (अन्नू कपूर) का हमेशा स्पम के मुहावरों में बात करना या माँ के किरदार में डोली का पंजाबी लफ्जों में अपने बेटे को कोसना । फिल्म की खासियत इसके साधारण पर सशक्त प्रस्तुतिकरण में है ।गीत संगीत के लहजे से पानी डा रंग और रम - विस्की अच्छे नंबर बन पड़े है।गीत के बोल ठीक- ठाक है पानी दा रंग को छोड़ कर किसी भी गीत के बोल ने बहुत प्रभावित नहीं किया है  ।सिनेमेटोग्राफी और एडिटिंग में कहने के लिए ज्यादा कुछ खास नहीं है ।

विकी डोनर एक आधुनिक विषय का प्रस्तुतिकरण है ,फिल्म की नज़र से पूरी तरह से मनोरंजक और विषय की नज़र से कुछ नया । फिल्म इंटरवल तक तो सुपरफास्ट ट्रेन की तरह भागती है पर उसके बाद थोड़ी धीमी हो जाती है , फिर भी यह धीमी गति फिल्म में बोर नहीं करती । इस फिल्म के लिए आखिर में इतना ही कहना काफी होगा की कॉमेडी के लिए फूहड़ता और बड़ी स्टार कास्ट की जरुरत नहीं होती बल्कि जरुरत होती है एक अच्छी स्क्रिप्ट और उसके अच्छे  निर्देशन  की जिसमे लेखिका जूही चतुर्वेदी और निर्देशक शुजित सरकार सफल हुए है।

 

Thursday, April 19, 2012

दान

सुबह - सुबह उसके छोटे से ठेले से उठती पोहे और जलेबी की खुशबु बरबस किसी भी भूखे पेट को अपनी और खींच लेने के काबिल थी और  यही मेरे साथ भी हुआ। मै चुम्बक की तरह उस दुकान की और खीच गया। दुकान पर थी नाश्ता करने वालो की भीड़ और दुकानदार का ठेठ मारवाड़ी अंदाज । आडर देने वाले कहते भिया इक पोए -जलेबी देना और दुकानदार कहता लो सेठ अपने  पोहे-जलेबी  हां महाराज आपको क्या दू । दो अलग अलग लहजे और बोली के शब्द मिलकर मीठी जलेबी और तीखे पोहे का काम कर रहे थे । मेने भी मारवाड़ी भैया से  कहा 'दादा इक पोहा कचोरी देना और ५० ग्राम जलेबी'।अभी मेने पोहे का पहला निवाला खाया ही था की  तभी वंहा पर इक अधेड़ उम्र की महिला आई और हाथ फैला कर भीख मांगने लगी ,उम्र होगी यही कोई ५० -६० साल, चेहरे पर दयनीयता और आँखों में सूनापन।उसके आते ही भीड़ थोड़ी कटने लगी कोई भी उसकी और नहीं देख रहा था और न ही उसकी मांग पर ध्यान दे रहा था । वो मेरे पास आई और बोलने लगी राजा बाबु कल से कुछ नहीं खाया कुछ खिला दे बेटा , भगवान तुझे तरक्की दे , तेरी छमक छमक लाड़ी आये बेटा ,कुछ नहीं तो एक चाय ही पिला दे । वेसे में भिखारियों को भीख देने में ज्यादा यकीं नहीं रखता पर उसकी हालात  देख मेने दुकानदार से  कहा भैया इनको एक पोहा दे देना दुकानदार ने मेरी और देखा और इस तरह मुंह बनाया जैसे  कह रहा हो कि बाबु जी इस औरत का रोज का ही काम है , पर मेने उसकी बात अनसुनी कर दी । मुझे  देख कर कुछ और लोगो ने १-२ रूपए के  खुल्ले पैसे उसे दे दिए । वो पोहे लेकर एक और जमीन पर बैठ गयी और खाने लगी और मुझे देख कर मुस्कुराने लगी ।मुझे यूँ  लगने लगा जेसे मैंने कोई महान काम कर दिया हो ,बचपन में पड़ी नैतिक शिक्षा की किताब के पन्ने मेरे आस पास से गुजरने लगे, मुझे लगा के मै  धर्मात्मा हूँ, दानी हूँ, मुझमे अब भी इंसानियत बाकि है, मेने अपने हिस्से में से किसी और को दिया ।यह सब सोच कर मेरी छाती फूलने लगी थी की तभी एक कुत्ता वहां  आ गया और एक और खड़े होकर हसरत से पूंछ हिलाने लगा वहां खड़े लोगो को घूरने लगा। मै कुत्ते कि हरकतों को देख रहा था कि  तभी पुचकारने की एक आवाज आई  और मेने देखा की वह अधेड़ महिला अपनी प्लेट में से कुछ पोहे कुत्ते के लिए निकाल रही थी ।

अब मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि दानी कौन है और इंसानियत कहाँ बची है ।

Wednesday, December 7, 2011

वाय थिस कोलावारी दी


मेरा एक दोस्त अचानक मुझसे बोलने  लगा की दादा (प्यार से मुझ से छोटे दोस्त मुझे दादा कहते है  पर में कही से भी दादा नहीं लगता ) आप इस गाने को कैसे  पसंद कर सकते हो जो की पूरी तरह से बेसिर पैर का है |. उसकी बात एक तरह से सही भी थी, मै अक्सर आपने दोस्तों के बीच एक अच्छा समीक्षक बनने की कोशिश करता रहता था(पता नहीं मेरा यह गुमान कब जायेगा या फिर शायद सच में किसी दिन बन जाऊ ) और आज में ही एक ऐसे गाने की तारीफ कर रहा था जो एक समीक्षक के नज़रिए से पूरी तरह से भाषा के व्याकरण की ऐसी तेसी करने वाला होना चाहिए |  पर यहाँ मै दिमाग से नही बल्कि दिल से सोच रहा था | मेरे दिल को ये गाना पसंद था और .घर आकर मैंने इस बात पर दिमाग को भी लगा दिया की आखिर इस गाने में ऐसा क्या है जो लोगो को अपनी तरफ अट्रेक्ट कर रहा है |  बहुत सोचने के बाद मैंने  यह पाया की ये  एक ऐसी अभिव्यक्ति है जो बचकानी है ,टूटी फूटी है ,सुसंस्कृत नही है और अंग्रेजी की ग्रामर का इतना भलता (अटपटा ) इस्तेमाल पर फिर भी इस गाने में एक बचपना है, मासूमियत है, भोलापन है , भाषा के बंधन से आजाद केवल भावनाए है जो संगीत के माध्यम में बह रही है| यह बिलकुल वैसा  है जेसे एक छोटे बच्चे की अजीब सी बोली जो मन को भा जाती है जिसके लिए उसका व्याकरण सम्मत न होना ही उसकी खूबी है  और यह खूबी  ही कोलावारी दी को इतना खास बना रही है |

इसके अलावा एक बात और है जिसने कोलावारी दी को "ड कोलावारी दी " बनाया  है और वह बात है कुछ नया स्वीकार करने  की हमारी प्रवत्ति |  हमेशा ५६ भोग खाने वाले के लिए खिचड़ी से बढ़िया व्यंजन  कोई और नहीं हो सकता | कभी कभी हम जानते है की जो हम कर रहे है वो सही नहीं है पर उस वक़्त वही करना अच्छा लगता है क्योंकी हमारे हाजमे की उस वक़्त की  मांग वही है|   यही हाल कोलावारी दी का भी है वो दाल, चावल, टमाटर, प्याज़, आलू , और मटर से सजी मसालेदार खिचड़ी है जो किसी के भी मुह में पानी ला देने के लिए काफी है | इस स्वाद पर कोई तर्क भारी नहीं पड़ सकता | .कभी..हिमेश रेशमिया ,अल्ताफ राजा के गानों पर भी इसी तरह का उन्माद दिखा था  वो अब बासी खिचड़ी है यह ताज़ी ताज़ी गरमारम खिचड़ी है  पर हां यह बात भी याद रखना पड़ेगी की खिचड़ी सिर्फ गर्म ही अच्छी लगती है तो थोड़े दिन जब तक माहोल गर्म है तब तक दिमाग  को साइड में रखकर गाते है | why this kolavari kolavari kolavari di ...why this kolavari kolavari di........धी धिन धिन..................आपकी प्रतिक्रियाओ के इंतजार में |

Saturday, September 3, 2011

ज्वलंत मुद्दों को उठाती फिल्म "बोल"


"बोल"  ,एक  कहानी  जो  साहस  है  औरत  का  , आइना  है पाकिस्तानी  हालात  का , और  एक मौका  है  यह  सोचने  का की  क्या  कत्ल करना  ही  गुनाह  है पैदा  करना नहीं  .पाकिस्तानी डायरेक्टर  शोएब  मंसूर   के  बेहतरीन  निर्देशन  से  सजी  ये  फिल्म  अपने  साथ  कई  मुद्दे  उठाती  है . 

यह  कहानी है जानिब  (हुमेमा  मालिक ) और उसके  परिवार  की जिसमे  7 बहने  और एक नपुंसक  भाई   है .जानिब के अब्बा   हाकिम  नवाबुदुला  (मंजर  सहबाई ) पुस्तेनी  राजवैध  है जो की शरणार्थी  के टूर  पर  दिल्ली   से आकर  कराची  में  बस  गए  .कहनी  की शुरुवात  होती  है जानिब  की फांसी से जहा  मुस्तफा (आतिफ  असलम  ) जानिब को  ये समझाता  है की उसे  अपनी  बात  एक बार  तो  कहना   चाहिए  और जानिब अपनी फांसी पर एक प्रेस  कांफ्रेंस  करने  की इज्ज़ाज़त मांगती  है.प्रेस कांफ्रेंस में जानिब बताती  है कि केसे  हालत  ने  उससे कातिल  बनाया  .वो  ढेर  सरे  सवालो  का पुलिंदा  छोडती  है दर्शक के ज़ेहन में  कि आखिर  क्यों  हम  धर्म  के नाम  पर ,इज्ज़त  के नाम पर और झूटी  शान  के नाम पर खुद  को और अपने घर  को बर्बाद  कर  लेते  है .

फिल्म कि पटकथा में कसावट है | गीतों में ताजगी है संगीत औसत श्रेणी का है और अभिनय वास्तविकता को लिए हुए पर तकनिकी तौर पर फिल्म कमज़ोर है.सिनेमेटोग्राफी ठीक कि श्रेणी में रखी जा सकती है. द्रश्यओ में विविधता कि कमी लगती है. 

फिल्म में  मुद्दों  को बहुत  ही लाज़वाब  तरीके  से उठाया  गया  है चाहे  वो मुद्दा  इस्लामिक  कटरपंती  खयालो  का हो  ,बेटे  कि चाहत  का ,मर्सी  किलिंग  का ,या  फिर  आज़ाद  खयालो का  .यह  फिल्म सिर्फ  पाकिस्तान  कि कहानी नही  है  बल्कि  यह हिंदुस्तान  के एक वर्ग  को भी  कटघरे  में खड़ा  करती  है जो बेटे की  लालच  में लडकियों   की लाइन  लगा  देते  है और औरत को सिर्फ बच्चा  जनने की मशीन  बना  देते है .

निर्देशक   शोइब  मंसूर की यह दूसरी  फिल्म है पर इतने  नाज़ुक  मुद्दों को उन्होंने  जिस  सम्वेंदंशिलता  से परोसा  है वो काबिले  तारीफ  है .यह फिल्म एक शानदार  मौका है पाकिस्तान को जानने  का    ,आतंकवाद  से  अलग  हटकर  उसकी  आम  जिंदगी  में  झाँकने  का और  उन  लोगो  को  चुप  करने  का   जो  कहते  है  की  आज  कल  अच्छी फिल्मे  नहीं  बनती  जिनसे  समाज  को दिशा  मिलती  हो  इस  फिल्म  में बुरी  बात  है तो  सिर्फ  एक  की  ये  बोडीगाड के  साथ  रिलीज़  हो गई .और जिस तरह  एक बड़ी  मछली  दूसरी  छोटी  मछली को निगल  जाती  है उसी   तरह एक खेल  तमाशे  की फिल्म एक सार्थक  फिल्म को टिकिट  खिड़की  पर  निगल रही  है .
                        आपके सुझावों के इंतजार में .......... लकुलीश शर्मा ( मात्राओ की गलती के लिए क्षमा करे वो वेब साईट की कुछ दिक्कत है )
  

Saturday, August 13, 2011

आरक्षण -ः जाना था जापान पहुच गए चीन


आरक्षण ये नाम ही चेहरे पर शिकन या मुस्कान लाने के लिए काफी है गर आरक्षण मिलने वाला हो तो मुस्कान और छीनने वाला हो तो शिकन ।

इस सम्वेदनशील मुद्दे को अपनी फिल्म के जरिये परोसने का काम किया है निर्माता निर्देशक प्रकाश झा ने

फिल्म की पृष्टभूमि भोपाल की है जहाॅ शकुंतला ठकराल महाविधालय एक प्रसिद्द महाविधालय है और प्रो. प्रभाकर (अमिताभ बच्चन वहा के प्रसिपल दीपक कुमार ( सेफ अली खान) जो कि हरिजन समुदाय से सम्बध रखता है वहाॅ का गेस्ट लेक्चरार है।पूर्वी प्रभाकर(दीपिका पादुंकोण) और सुशांत सेठ(प्रतिक बब्बर वहाॅ पढते है ।सुश्ंाात,पूर्वी,दीपक तीनो अच्छे दोस्त है।फिल्म का एक मुख्य किरदार मिथलेश सिंह (मनोज वाजपेयी भी वहीं पर पढाता है ।जिसका प्रायवेट कोचिंग इस्टीटुयुट भी है।


फिल्म की शुरुआत होती है इस मुद्दे के साथ कि प्रायवेट कम्पनी में जाति और स्तर के आधार पर चयन किया जाता है।वहीं सरकारी विभाग में कोटे के नाम पर पद बाटें जाते है। इस बात को लेकर सुशंात सेठ और दीपक दोनो को अपनी जिंदगी मे दिक्कतो का सामना करना पडता है ।इस बात के कारण दीपक आरक्षण का समर्थक बन जाता है वहीं सुशंात विरोधी ।इसी वक्त सुप्रीम कोर्ट का एक आदेश पारित होता है जिसमे 27 प्रतिशत आरक्षण बढा दिया जाता है इस मुद्दंे पर सुप्रिम कोर्ट का समर्थन करने पर प्रो प्रभाकर (अमिताभ को काॅलेज से निकाल दिया जाता है और उनका धर भी उनसे छीन जाता है। बाकि कि पूरी फिल्म प्रभाकर के आत्मसम्मान और धर वापस पाने की कहानी को बंया करती नजर आती है ।


आरक्षण के साथ -साथ इस फिल्म मे शिक्षा के व्यवसायिकरण पर भी जोर दिया गया है और यह जोर इतना है कि फिल्म के 45 मिनिट बीत जाने पर फिल्म आरक्षण बनाम अनारक्षण से हटकर प्रायवेट कोचिंग बनाम सही शिक्षा व्यवस्था पर केन्द्रीत हो जाती है।

फिल्म के सशक्त पहलु में अमिताभ बच्चन सेफ अली खान और दीपिका की एक्टींग और डायलाॅग को रखा जा सकता है वही फिल्म की एडिटिंग सिनेमेटोग्राफी और टीªटमेटं कमजोर कडh है।


फिल्म की गति कई द्दश्यो में टुटती नजर आती है।वहीं सिनेमेटोग्राफी ने न तो भोपाल की खुबसुरती को परोसा है और न ही अभिनेता के अभिनय को ।फिल्म के गाने अच्छे बन पडें है और पाश्र्वसगींत ने भी अच्छी भूमिका को निभाया है पर जब गाने स्क्रिन पर दिखाई देते है तो हीरो के होटं से मेल ही नही खाते ।इन सारी बातों को नजरअदांज कर भी दिया जाए तब भी सबसे ज्यादा निराशा इस बात से होती है कि फिल्म का नाम आरक्षण है पर पूरी फिल्म शिक्षाः सेवा या व्यवसाय इस बात पर धुमती है।फिल्म में आरक्षण के मुद्दे को छुआ भर है और कुछ नही ।


प्रकाश झा ने राजनीति में भोपाल को पहले भी दिखाया था पर इस फिल्म मे पूरा परिदृश्य भोपाल केन्द्रीत है ।ऐसे में अचरज की बात है कि किसी अभिनेता के डायलाग में भोपाली टच नही है। इंतहा तो यह है कि तबेलेवाला भी युपी की टोन मे बात करता है। जबकि भोपाल की अपनी एक जबान है तरिका है जो पूरी फिल्म मे कहीं नजर नही आता।


कुल मिलाकर फिल्म मसालेदार है जिसमें सैफ अमिताभ और दीपिका के दमदार अभिनय और डायलाग का तडका है। अच्छे गीत सगींत की मजेदार करी है पर यह मसाला आरक्षण नाम की लुभावनी डिश को मजेदार नही बना पाता है ।फिल्म देख कर ऐसा लगता है कि जाना था जापान पहुच गए चीन।


Saturday, August 6, 2011

ये आफिस जरा देखा- भाला है।


चला मुसद्वी आॅफिस-आॅफिस‘‘ यह शीर्षक फिल्म की पूरी कहानी बंया करने के लिए काफी है क्योकि टी.वी के प्रसिद्व सिरियल आॅफिस- आॅफिस और उसके मुसद्वी( पंकज कपूर ) को कौन नही जानता ।जब नाम से ही फिल्म की कहानी का पता चल जाए तो ऐसे हालाथ में दर्षको को सिनेमा हाॅल के अन्दर आने को मजबुर करना जरा टेड.ी खीर है और इस खीर को पकाने में निर्माता और निर्देषक राजीव मेहरा कुछ खास सफल नजर नही आए।


फिल्म की कहानी सरकारी और गैर सरकारी आॅफिस के भष्टाचार और निकम्मेपन की कलई खोलती नजर आती है धर्मस्थलो पर पडिंतो की लुट है तो अस्पताल में डाक्टरो की हर तरफ सिर्फ आम आदमी ही परेषान है और फिल्म मे यह आम आदमी है मुसद्वीलाल वह अपने दम पर इन सब से लोहा लेता है और आखरी में भष्टाचार के खिलाफ इस लड.ाई मे जीत जाता है ।


फिल्म मे सभी किरदारो का अभिनय लाजवाब है पकंज कपूर , मनोज पहवा, असावरी जोषी ने अपने स्वाभाविक अभिनय से कमाल किया है पर वही देखी हुई कहानी उस पर कमजोर निर्देषन ने पूरे 111 मिनिट तक बोर करने का काम किया है ।फिल्म जब शुरु होती है तब लगता है कि कहानी धीरे धीरे रफ्तार पकडती जाएगी पर यह कहानी तो आखिर तक लोकल टैªन की ही धीमी रहती है।


कुल मिलाकर देखा जाए तो इस फिल्म की कमी इतनी ही है कि इस कहानी को हम पहले से ही जानते है क्योकि एक तो यह , सिरियल आॅफिस- आॅफिस का फिल्मी रिमेक है और दुसरा कारण यह कि भष्टाचार हमारी रग- रग में पहले ही बसा हुआ है जिसे देखने के लिए किसी थियेटर में जाने की आवष्यकता नही ।